यहां शिवलिंग पर जल अर्पण से आती है 'ॐ' की प्रतिध्वनि...
नर्मदा नदी के किनारे बसे नगर नेमावर के प्राचीन सिद्धनाथ महादेव के मंदिर की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। महाभारत काल में नाभिपुर के नाम से प्रसिद्ध यह नगर व्यापारिक केंद्र हुआ करता था। राज्य शासन के रिकॉर्ड में इसका नाम 'नाभापट्टम' था। यहीं पर नर्मदा नदी का 'नाभि' स्थान है।
मंदिर नर्मदा तट के निकट छोटी-सी पहाड़ी पर बना है। पहाड़ी के सबसे ऊपर भीम द्वारा बनाया गया एक अधूरा मंदिर भी है। हिन्दू और जैन पुराणों में इस स्थान का कई बार उल्लेख हुआ है। इसे सब पापों का नाश कर सिद्धिदाता तीर्थस्थल माना गया है।
मान्यता है कि सिद्धनाथ मंदिर के शिवलिंग की स्थापना चार सिद्ध ऋषि सनक, सनन्दन, सनातन और सनत कुमार ने सतयुग में की थी। इसी कारण इस मंदिर का नाम सिद्धनाथ है। इसके ऊपरी तल पर ओंकारेश्वर और निचले तल पर महाकालेश्वर स्थित हैं। श्रद्धालुओं का ऐसा भी मानना है कि जब सिद्धेश्वर महादेव शिवलिंग पर जल अर्पण किया जाता है तब 'ॐ' की प्रतिध्वनि उत्पन्न होती है।
मंदिर निर्माण की अनेक कथाओं में से एक कथा महाभारत कालीन है। बताया जाता है कि कौरवों एवं पांडवों के बीच एक रात में मंदिर निर्माण की शर्त लगी। कौरव की संख्या अधिक होने से उन्होंने एक ही रात में तत्कालीन सिद्धनाथ मंदिर जा निर्माण कर दिया, जबकि पांडवों की संख्या कम थी। अतः उनका मंदिर अधूरा ही बन पाया, जो आज भी मुख्य मंदिर से पास ही मणिगिरी पर्वत पर वैसी ही अवस्था में स्थित है। कौरवों ने मंदिर निर्माण कर पांडवों को अभिमानवश होकर चिढ़ाना शुरू कर दिया। इससे भीम ने क्रोधित होकर मंदिर को घुमाकर मंदिर का मुख द्वार पूर्व से पश्चिम दिशा में कर दिया, जो आज भी है। मंदिर के स्तंभों और दीवारों पर शिव, यमराज, भैरव, गणेश, इंद्राणी और चामुंडा की कई सुंदर मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। कई विद्वानों की मानें तो मन्दिर पर बनाई गई मूर्तियां विश्व में एक अद्भुत कलाकृतियां हैं। इसके शिखर का निर्माण 3094 वर्ष ईसा पूर्व किया गया था। 10वीं और 11वीं सदी के चंदेल और परमार राजाओं ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया।
एक मान्यता यह भी है कि सिद्धनाथ मंदिर के पास नर्मदा तट की रेती पर सुबह-सुबह पदचिह्न नजर आते हैं, जहां पर कुष्ठ रोगी लोट लगाते हैं। ग्राम के बुजुर्गों का मानना है कि पहाड़ी के अंदर स्थित गुफाओं, कंदराओं में तपलीन साधु प्रात:काल यहां नर्मदा स्नान करने के लिए आते हैं। नेमावर के आस-पास प्राचीनकाल के अनेक विशालकाय पुरातात्विक अवशेष मौजूद हैं। यहां शिवरात्रि, संक्रांति, ग्रहण व अमावस्या आदि पर्वो पर श्रद्धालु स्नान-ध्यान करने आते हैं। इस स्थान के आसपास पुरातात्विक महत्व के कई और प्राचीन मंदिर भी हैं।
यह स्थान इंदौर से मात्र 130 किमी दूर दक्षिण-पूर्व में हरदा रेलवे स्टेशन से 22 किमी तथा उत्तर दिशा में भोपाल से 170 किमी दूर पूर्व दिशा में स्थित है। यहां से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा देवी अहिल्या एयरपोर्ट है। सड़क मार्ग से यहां पहुंचने के लिए इंदौर से बस या टैक्सी ली जा सकती है।
परिवार के साथ यहां जाने के लिए सबसे अच्छा समय सितंबर से मार्च महीने के बीच होता है। इसके अलावा यहां बारिश के मौसम में मौसम बहुत ही सुहाना हो जाता है, इसलिए एक बड़ी संख्या में पर्यटक बारिश के मौसम में भी यहां देखे जाते हैं।